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 रिपोर्ट : देश के एक चौथाई दिव्यांग बच्चो को क ख ग का अक्षर ज्ञान नहीं ! (Thu, Jul 4th 2019 / 09:14:21)

 


चन्द्रिका प्रसाद तिवारी
देश के पांच से 19 आयु वर्ग के बीच एक चौथाई दिव्यांग बच्चे क ख ग से पूरी तरह दूर हैं। इसमें से तीन चौथाई आंकड़ा पांच वर्ष तक आयु वर्ग का है। लड़कों के मुकाबले लड़कियों की शिक्षा से जुड़ने का आंकड़ा सबसे कम है। यह खुलासा स्टेट ऑफ द एजुकेशन रिपोर्ट फॉर इंडिया (चिल्ड्रेन विद डिसेबिलिटी) 2019 की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट में मोदी सरकार द्वारा दिव्यांग छात्रों को शिक्षा से जोड़ने संग मूलभूत सुविधाएं मुहैया करवाने पर संतुष्टि जताई गई है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज द्वारा 2017-2018 के बीच शोध अध्ययनों के आधार पर तैयार रिपोर्ट को यूनेस्को ने भी मान्यता दी है।
दिल्ली में बुधवार को यूनेस्को और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने संयुक्त कार्यक्रम में सर्वे रिपोर्ट जारी किया। यूनेस्को के दिल्ली निदेशक एरिक फाल्ट ने कहा कि भारत ने विशेष वर्ग के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा, कार्यक्रम व योजनाओं को एक श्रेणी में डालने के मामले में काफी काम किया है। इसी के चलते दिव्यांग छात्रों की नामांकन दर में सुधार हुआ है। लेकिन ऐसे बच्चों के साथ शिक्षकों का रवैया ठीक नहीं है। 
रिपोर्ट में नीति आयोग के न्यू इंडिया 75 शिक्षा एजेंडा पर फोकस किया गया है। इसमें कहा गया है कि राष्ट्रीय व स्थानीय स्तर पर दिव्यांग छात्रों की सफलता की कहानी को अन्य विशेष बच्चों तक पहुंचाएं।
रिपोर्ट के महत्वपूर्ण बिंदू :
. भारत में पांच वर्ष से कम आयु के कुल 368.697  विशेष बच्चे हैं। इनमें से 27 फीसदी छात्र स्कूलों में पढ़ते हैं। जबकि 72 फीसदी बच्चे स्कूल ही नहीं गए। एक फीसदी बीच में स्कूल छोड़ देते हैं।
- पांच साल से कम आयु के 40.801 बच्चे विशेष स्कूलों में पढ़ते हैं। इसमें 47 फीसदी बच्चियां और 53 फीसदी लड़के हैं। पांच से 19 वर्ष आयु वर्ग के तहत स्कूली शिक्षा में सामान्य बच्चों का आंकड़ा 70.97 और विशेष बच्चों का 61.18 फीसदी है। सामान्य बच्चों की पढ़ाई छोड़ने का आंकड़ा 11.82 फीसदी तो विशेष का 12.14 फीसदी है। सामान्य में 17.21 फीसदी बच्चे कभी स्कूल नहीं जा पाते हैं। जबकि विशेष में यह आंकड़ा 26.68 फीसदी है।
- भारत में 54.39 फीसदी बच्चों को बहु दिव्यांगता है।
- 2014-15 से 2016-17 तक की तुलना करें तो प्राइमरी में बच्चों के इनरोलमेंट में कमी आई है। 2014-15 में यह आंकड़ा 15,67,633 था तो 2016-17 में 13,52,162 पहुंच गया है। अपर प्राइमरी में 750230 से गिरकर 745153 और सेकेंडरी में 219571  से 218261 है। - गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र में जेंडर अनुपात में सेकेंडरी व हायर एजुकेशन में अंतर है। जबकि हिमाचल प्रदेश, पंजाब व तेलंगाना में विशेष लड़कियों की स्कूलों में संख्या अधिक है।
केंद्र और राज्य सरकारों के लिए मुख्य सिफारिशें
- ऐसे बच्चों को शिक्षा की विशिष्ट समस्याओं को शामिल करते हुए आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम के साथ बेहतर मिलान करने के लिए आरटीई अधिनियम में संशोधन। राज्य संशोधन को अनिवार्य रूप से लागू करे।
- बच्चों तक शिक्षा कार्यक्रम पहुंचाने के लिए एक समन्वय तंत्र स्थापित करना। जबकि राज्य सभी विभाग संयुक्त रूप से मिलकर उन्हें शिक्षा से जोड़ने व योजनाओं को लागू करना सुनिश्चित करें।
-शिक्षा बजट में अलग से फंड का प्रावधान अनिवार्य करना। इनोवेशन, तकनीक से विशेष बच्चों को पढ़ाई से जोड़ना।
छात्र-छात्रा की अलग-अलग विस्तार से डेटा तैयार करना
- स्कूल पारिस्थितिकी प्रणालियों को समृद्ध बनाकर हितधारकों को शामिल करना।
- दिव्यांग बच्चों की शिक्षा के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग का व्यापक विस्तार करना।
- ऐसे बच्चों के लाभ के लिए सरकार, नागरिक समाज, निजी क्षेत्र व स्थानीय समुदायों को शामिल करने वाली प्रभावी भागीदारी को प्रोत्साहन देना।
स्कूलों में पढ़ाई कर रहे विशेष छात्र
राज्य                 नौंवी-दसवीं          11 और 12वीं कक्षा (लड़के-लड़कियां)
हिमाचल प्रदेश          1078-803            489-506
पंजाब                 3559-3977              1483-1881
हरियाणा               2477-1757             755-647
उत्तर प्रदेश            3525-2891             2139-1697
उत्तराखंड             574-472                  311-330
जम्मू कश्मीर       736-662                  212-230
दिल्ली              3259-2461              1898-1447

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