Thursday 26th of November 2020
खोज

 
livehindustansamachar.com
समाचार विवरण  
 किसी मित्र को मेल पन्ना छापो   साझा यह समाचार मूल्यांकन करें      
Save This Listing     Stumble It          
 चीन ने इतिहास दोहराया है लेकिन भारत में ही बदलाव नहीं ! (Sun, Jun 21st 2020 / 19:25:54)

 


चन्द्रिका प्रसाद तिवारी
लद्दाख क्षेत्र में भारत और चीन के बीच हिंसक टकराव को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री ने विपक्ष और देश को आश्वस्त किया कि भारत की किसी भी चौकी पर चीन ने कब्जा नहीं किया है और एलएसी पर हमारी पेट्रोलिंग क्षमता बढ़ी है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश को यह भरोसा भी दिलाया कि कोई भी हमारी ओर आंख उठाकर भी नहीं देख सकता।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भरोसा भी दिया कि गलवां घाटी में जो हुआ उसे लेकर भारत ने चीन को अपना सख्त विरोध सभी माध्यमों से जता दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान इस बात का संकेत है कि गलवां घाटी में चीनी सेना के हाथों बीस भारतीय सैनिकों की शहादत और दस सैनिकों को बंधक बनाए जाने की घटना के बावजूद भारत चीन के साथ टकराव बढ़ाना और रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहता है।
भारत क्षेत्रीय शांति भंग करने के पक्ष में नहीं है लेकिन उसकी इस भावना को उसकी कमजोरी न माना जाए। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि भारत अपनी सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम है। भारत के इस रुख को चीन किस तरह लेता है यह भविष्य बताएगा। भारत-चीन सीमा पर चीनी सैनिकों का व्यवहार इसका संकेत होगा कि चीन भारत की शांतिप्रियता को उसकी कमजोरी समझता है या जो हुआ उसे भूलकर अपनी तरफ से भी कोई उकसाने वाली कार्रवाई न करके भारत की भावना का सम्मान करेगा।
सवाल उठता है कि पठानकोट के बाद उरी सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक के जरिए दो-दो बार पाकिस्तान को सबक सिखाने वाले नरेंद्र मोदी चीन की गलवां हरकत पर इतनी सधी हुई प्रतिक्रिया क्यों है। इसका जवाब भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन के रिश्तों का और परिस्थितियों का विश्लेषण में मिलेगा और उससे प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिक्रिया का अर्थ और कारण
समझ में आ जाएगा।
दरअसल चीन के साथ रिश्तों को लेकर नेहरू हों या नरेंद्र मोदी दोनों सरकारों की एक ही कहानी है और अंजाम भी करीब-करीब वही चीनी धोखा। कहते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता है लेकिन कुछ बदलाव के साथ। चीन के साथ भारत के रिश्तों में यही हो रहा है। नेहरू ने माओ चाउ के साथ दोस्ती की पींगे बढ़ाईं, तो नरेंद्र मोदी ने शी जिनपिंग को अहमदाबाद में झूला झुलाया और वूहान से लेकर महाबली पुरम तक दोनों साथ साथ घूमें।
दोनों ही प्रधानमंत्रियों नेहरू और मोदी की अमेरिका से बढ़ती नजदीकी चीन को नागवार गुजरी और अमेरिका मौके पर तटस्थ हो गया। नेहरू अगर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की दोस्ती से निहाल थे, तो नरेंद्र मोदी को अपने दोस्त अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भरोसा है। लेकिन न तब अमेरिका भारत के बचाव के लिए आगे आया और न अब।
रूस जो नेहरू के समय सोवियत संघ था, यह कहकर तटस्थ हो गया कि भारत उसका दोस्त है और चीन उसका पड़ोसी और बिरादराना (कम्युनिस्ट) भाई। इस बार भी रूस खामोश है और उसने अमेरिका जैसी प्रतिक्रिया कि हम नजर रखे हुए हैं, नहीं दी है। तब भी भारत ने चीन का मुकाबला अपनी दम पर किया था भले ही उसे पराजित होना पड़ा था, और अब भी उसे चीन से जो कुछ पाना है अपनी दम पर ही पाना होगा।
अब थोड़ा और गहराई में चलते हैं। 1947 में आजादी से पहले ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस पार्टी और चीनी क्रांति के लिए लड़ रही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच अंतर्दलीय संबंध बेहद मजबूत हो गए थे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों से ही जवाहर लाल नेहरू और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेता चाउ एन लाई के बीच दोस्ताना रिश्ते हो गए थे। माओ की अगुआई में जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में उसकी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) जब जापानी सेना से मुक्ति संग्राम लड़ रही थी, तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने डा.द्वारिका नाथ कोटनीस के नेतृत्व में डाक्टरों का एक दल उनकी चिकित्सकीय सहायता के लिए भेजा था और उस लड़ाई में घायल चीनी सैनिकों का इलाज करते करते डाक्टर कोटनीस की मृत्यु चीन में ही हो गई थी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इन दोस्ताना रिश्तों की पृष्ठभूमि में ही आजाद लोकतांत्रिक भारत और मुक्त साम्यवादी चीन के बीच पंचशील और हिंदी-चीनी भाई-भाई का सुनहरा दौर शुरू हुआ। चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। भारत ने दलाई लामा को राजनीतिक शरण दे दी। लेकिन दोनों देशों के रिश्ते आगे बढ़ते रहे। आजाद भारत के स्वप्नदर्शी प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दो ध्रुवों में बंट चुकी दुनिया के बीच में एक नया और तीसरा ध्रुव बनाने में जुटे थे, जिसके सदस्य देश सोवियत संघ और अमेरिका के नेतृत्व वाले दोनों गुटों में से किसी के साथ भी संबद्ध न हो और दोनों के साथ समान दूरी और व्यवहार करते हुए अपने विकास का रास्ता खुद तय करें।नेहरू निगुर्ट राष्ट्रों के सम्मेलन के जरिए विश्व राजनीति में अपनी अलग छवि बना रहे थे और चीन भारत की दोस्ती भी परवान चढ़ रही थी। दोस्ती के इसी दौर में दोनों देशों के बीच सीमा रेखा को लेकर विवाद भी शुरू हुआ। भारत का जोर अंग्रेजों की खींची गई मैकमोहन रेखा को भारत चीन के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा माने जाने पर था, जबकि चीन का तर्क था वह ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा खींची गई मैकमोहन रेखा को नहीं मानता। उसका दावा लद्दाख क्षेत्र में हजारों किलोमीटर के उस इलाके पर था, जो भारत के पास था।
दरअसल तिब्बत पर चीन के कब्जे से पहले भारत और चीन के बीच तिब्बत एक बफर देश था, लेकिन तिब्बत पर कब्जा करके चीन ने अपनी सीमाएं भारत तक बढ़ा ली थीं। चीन तिब्बत को प्राचीन काल से ही अपना हिस्सा मानता था, इसलिए उसने पुरानी भारत-तिब्बत सीमा के लंबे चौड़े इलाके पर अपना दावा किया, जिसे चीन से तमाम दोस्ती के बावजूद भारत ने नामंजूर कर दिया। चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई की भारत यात्राओं से भी कोई हल नहीं निकला।
चाउ एन लाई ने नेहरू को जो प्रस्ताव दिए उन्हें नेहरू ने नहीं माना। उधर सोवियत संघ में जोसेफ स्तालिन के मृत्यु के बाद सत्ता निकिता ख्रुश्चेव के हाथों में आई और उनके साथ चीन के सर्वोच्च नेता माओ त्सेतुंग के गंभीर वैचारिक मतभेद हो गए, जो जल्दी ही चीन और रूस के बीच तनाव में बदल गए। इसी दौर में अमेरिका में सत्ता बदली और डेमोक्रेट जॉन एफ कैनेडी राष्ट्रपति चुने गए और उनकी भारत नीति ने अमेरिका औऱ भारत को काफी करीब ला दिया। नेहरू को अमेरिका की सरपरस्ती और चीन की दोस्ती पर पूरा भरोसा था। लेकिन दिसंबर 1962 में नेहरू के ये दोनों भरोसे टूट गए जब चीन ने भारत पर हमला कर दिया और अमेरिका सात समंदर पार से तमाशा देखता रहा।
आगे की कहानी जगजाहिर है कि युद्ध में भारत की शर्मनाक पराजय हुई और चीन भारत के 38 हजार वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा इलाके को कब्जा कर लिया।
इसके बाद भारत और चीन के रिश्तों में दुश्मनी का दौर शुरू हुआ। नेहरू के बाद भारत की लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी की सरकारों ने चीन पर भरोसा नहीं किया और दोनों देशों के बीच तनाव और कड़वाहट बढ़ती गई। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद चीन में जबर्दस्त सत्ता संघर्ष के बाद 1980 में तंग श्याओ फंग और उनके समर्थक गुट ने चीन की सत्ता पर अधिकार किया। माओ के कट्टर साम्यवादी विचारों के उलट तंग व्यवहारवादी राजनेता थे। तंग श्याओ फंग के शुरू किए गए चीन के चार आधुनिकीकरण कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए चीन को क्षेत्रीय शांति और एशिया के विस्तृत बाजार की जरूरत थी, जो बिना भारत के साथ रिश्ते सुधारे मुमकिन नहीं था।
इधर भारत में भी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बने थे और वह लीक से हटकर कुछ करने के इरादे से काम कर रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में भारत और चीन के दोस्ताना रिश्तों की नई इबारत लिखी गई। राजीव गांधी की एतिहासिक चीन यात्रा से दोनों देशों के बीच दशकों से जमी बर्फ पिघली और दुनिया ने वह तस्वीर बड़े चाव से देखी, जब युवा राजीव गांधी का हाथ अपने हाथ में लेकर बुजुर्ग तंग श्याओ फंग कई मिनट तक मिलाते रहे।
राजीव गांधी और तंग श्याओ फंग के बीच बनी सहमति के साथ ही दोनों देशों ने आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों में तेजी से सुधार लाना शुरू कर दिया। राजीव गांधी के बाद नरसिंह राव अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारों ने दोस्ताना रिश्तों की इस प्रक्रिया को और तेज किया। भारतीय प्रधानमंत्रियों की चीन यात्राओं औऱ चीनी नेताओं की भारत यात्राओं से कई समझौते हुए, जिनसे भारत में चीनी निवेश और व्यापार का रास्ता खुला। दोनों देशों के बीच तय हो चुका था कि सीमा विवाद को लेकर बातचीत के दौर चलते रहेंगे, लेकिन उससे भारत चीन के आर्थिक सांस्कतिक सामाजिक और कूटनीतिक रिश्तों पर असर नहीं पड़ेगा और इन क्षेत्रों में दोनों देश आगे बढ़ते रहेंगे।
चीन की तरक्की से भारत और भारतीय अभिभूत होने लगे और धीरे धीरे भारत के बाजार, उद्योग, व्यापार, वाणिज्य, तकनीक हर क्षेत्र में चीन और चीनी सामान छा गया। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी कुछ मुद्दों पर मतभेद के बावजूद दोनों देशों का सहयोग बढ़ने लगा। चीन की तरक्की से भारत के वामपंथी और कांग्रेसी ही नहीं दक्षिण पंथी भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता भी बेहद प्रभावित होने लगे। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने चीन की कई बार यात्रा की और भारत को भी चीन की तरक्की और उसके मॉडल से सीखने की बात बार-बार की।
प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ समारोह में जहां सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाया तो उसके फौरन बाद सबसे पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत में दिल खोल कर स्वागत किया। अहमदाबाद के साबरमती रिवर फ्रंट में झूले पर बैठे मोदी और जिन पिंग की तस्वीरें उसी तरह दुनिया ने प्रमुखता से देखीं जैसे कभी राजीव गांधी और तंग श्याओ फंग की हाथ मिलाने की तस्वीर देखी गई थी। नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में भारत-चीन की दोस्ती इस कदर परवान चढ़ी कि दोनों देशों के बीच 2020 तक करीब 87 अरब डॉलर का व्यापार हो गया।
डोकलाम में दोनों देश एक बार आमने-सामने हुए लेकिन मोदी और जिनपिंग ने कूटनीतिक स्तर पर उसे सुलझा लिया और टकराव टल गया। इसके बाद वुहान और महाबली पुरम में दोनों नेताओं की  अनौपचारिक बिना एजेंडे की मुलाकातों ने भारत चीन के बीच दोस्ती की मजबूती का आभास दुनिया को दिया। शायद ये आभास ही था क्योंकि जब दोबारा ज्यादा बड़े बहुमत से नरेंद्र मोदी सरकार बनी
तो छह महीने के भीतर ही कई बड़े फैसले लिए, जिनमें जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 में बदलाव और राज्य के पुनर्गठन का फैसला भी था, जिसके तहत लद्दाख और जम्मू कश्मीर को अलग अलग केंद्र शासित क्षेत्र बना दिया गया।संसद में जब यह विधेयक पारित हो रहा था, तो गृहमंत्री अमित शाह ने पाक अधिकृत कश्मीर और चीन के कब्जे वाले अक्साइ चिन पर भारत के दावे को दोहराया, जिसका पूरे  सदन ने समर्थन किया। चीन को भारत का यह फैसला अखर गया और तब से ही उसके तेवर बदल गए। चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अन्य वैश्विक मंचों पर भारत के इस कदम का विरोध किया। जबकि भारत ने कहा कि उसका यह फैसला उसका आंतरिक मामला है और पूरी दुनिया ने भारत की इस बात का समर्थन किया। बौखलाए चीन ने भारत को घेरना शुरू कर दिया। एक तरफ उसने लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक सीमाओं पर भारी सैनिक जमावड़ा किया तो दूसरी तरफ नेपाल को भारत के खिलाफ उकसाकर लिपुलेख और कालापानी का विवाद शुरू करा दिया।
जनवरी से ही लद्दाख क्षेत्र में चीनी सेना भारतीय सीमा पर अपनी गतिविधियां बढ़ानी शुरू कर दीं और मई तक उसने विवादित क्षेत्र में न सिर्फ कई पक्के निर्माण कर लिए, बल्कि गलवां नदी घाटी में उन बिंदुओं पर बैठ गई, जहां भारतीय सेना के गश्ती दल गश्त किया करते थे और जिन पर कोई निर्माण नहीं था। इसके बाद 15-16 जून की रात वो हिंसक मुठभेड़ हुई, जिसमें भारतीय सेना के 20 सैनिक शहीद हुए औऱ दस को चीनी सेना पकड़ लिया जिन्हें बाद में छोड़ा गया।
अब गलवां घाटी को लेकर भारत चीन आमने-सामने है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि भारत की एक इंच जमीन भी किसी के कब्जे में नहीं है और न ही भारत की किसी चौकी पर किसी का कब्जा है। प्रधानमंत्री के बयान पर विपक्ष ने जब सवाल उठाया कि अगर भारत की जमीन पर चीनी सैनिक नहीं घुसे तो भारतीय सैनिक क्या चीन की सीमा में शहीद हुए। इसका स्पष्टीकरण प्रधानमंत्री
कार्यालय ने यह कह कर दिया कि चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में अतिक्रमण की कोशिश की, जिसे भारतीय सैनिकों ने अपनी शहादत देकर असफल कर दिया।
चीनी सैनिकों की बर्बरता को लेकर भारत में जबरदस्त है और चीनी सामान के बहिष्कार की अपीलें की जा रही हैं। सरकार पर भी दबाव है कि वह चीन को इस हिमाकत का सबक सिखाए, जिससे सेना और देश का मनोबल बना रहे। ये दबाव इसलिए भी है कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में पठानकोट और पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले का भारतीय सेना ने उरी और बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए पाकिस्तान को करारा जवाब दिया था। उसने देश के लोगों में यह भावना पैदा कर दी है कि अब चीन को भी कुछ एसा ही सबक सिखाया जाना चाहिए। लेकिन पाकिस्तान में भारत ने आतंकवादी अड्डों को तबाह किया था। जबकि इस बार चीन की सेना से सीधे भिड़ंत हुई है और उरी या बालाकोट जैसी कार्रवाई का मतलब सीधा युद्ध है।
जिसके लिए शायद अभी देश तैयार नहीं है। दूसरे भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजार में जिस हद तक चीन की हिस्सेदारी बढ़ी हुई है, उसकी वजह से भी चीन के साथ युद्ध मोल लेना वह भी तब जब कोरोना की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए समय और सहारे की जरूरत है, न तार्किक है और न ही दूरगामी देशहित में है। साथ ही, भारत अपनी तरफ से युद्ध जैसी स्थिति पैदा करके अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में अपनी छवि आक्रांता की नहीं बनाना चाहता है। यही कुछ कारण हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी छवि के विपरीत लद्दाख मुद्दे पर बेहद संतुलित और संयमित रुख अपनाए हुए हैं।
भारत ने अपने बीस सैनिकों को मारे जाने की घटना पर चीन से तीखा विरोध दर्ज करा दिया है। साथ ही, सेना और कूटनीतिक चैनलों के जरिए चीन से बातचीत करके विवाद को सुलझाने की पूरी कोशिश हो रही है। प्रधानमंत्री के इस कथन के बाद कि भारत की एक इंच जमीन किसी दूसरे देश के कब्जे में नहीं है और न ही हमारी किसी चौकी पर कोई कब्जा हुआ है, से साफ संकेत है कि भारत इस मुद्दे जो ज्यादा तूल न देकर संघर्ष और टकराव को टालना चाहता है।
साथ ही, भारत ने चीन के गलवां घाटी पर अपना दावा जताने को भी खारिज करके यह जता दिया है कि उसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर किसी भी तरह का बदलाव मंजूर नहीं है। अब यह चीन पर निर्भर है कि वह भारत के रुख का क्या और कैसा जवाब देता है।

livehindustansamachar.com
 
समान समाचार  
livehindustansamachar.com
     
आर्थिक विकास दर की गिरावट केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती

चन्द्रिका प्रसाद तिवारी
कोरोना काल का सबसे बड़ा आर्थिक दुष्प्रभाव अब देश के सामने है। जब सरकार के आपने आकलन के मुताबिक इस वर्ष अप्रैल से जून के तिमाही के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर घट कर शून्य से भी नीचे

read more..

आर्थिक विकास दर की गिरावट केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती

....................................... ...तो हिंदुस्तान महाशक्ति होता !

हिंदुस्तान का ''दुश्मन नंबर एक'' पाकिस्तान नहीं चीन बन गया

भारत की क्या है , International border ,LoC and LAC !

चीन से सीख लेकर ही पाया जा सकता है वैश्विक महामारी Corona पर काबू !

संपादकीय : भीड़ की भयावह हिंसा

संपादकीय : नकारात्मक राजनीति

संपादकीय : देश की जनता को लंबे चुनाव प्रचार से मुक्ति

संपादकीय : बेनकाब होता पाकिस्तान का असली चेहरा

पाकिस्तान का असभ्य, अभद्र और भड़काऊ चेहरा उजागर !

भारतीय राजनीति में भाषा की मर्यादा का उल्लंघन

सबसे दुखद है किसी अच्छे प्रयास का पराजित हो जाना !

नेपाल-पाकिस्तान के बहाने भारत को घेर रहा चीन !

सम्पादकीय : संविधान की सत्ता का सवाल ?

राष्ट्रीय प्रेस दिवस : लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका संदेस्पद

नाम नहीं सिस्टम बदलें माननीय !

डिजिटल इंडिया में विकास निधि तक नहीं खर्च पाए सांसद !

71 का देश, 70 का रुपया और बचकाना नेतृत्व

दुराचार रोकने को कानून वस नहीं संस्कार भी जरूरी !

वायदे पर खरा नहीं उतरते तो देश में होगा नकदी का संकट

किसानों ने जीती जंग, मुंबई ने जीता दिल

अर्थव्यवस्था के मोर्चे से दोहरी राहत

जीत का परचम : शून्य से शिखर तक का सफर

स्थापना दिवस : मैं हूं मध्य प्रदेश... : जन्म से उत्थान तक

संपादकीय : आधार योजना पर उठे संवैधानिक सवाल

संपादकीय : जातीय गोलबंदी का मिसाल फ़िलहाल गुजरात !

गुजरात चुनाव : परियोजनाओं के लॉलीपॉप के भरोसे बीजेपी !

संपादकीय : गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में त्रासदी नहीं, जन-संहार है

संपादकीय : चाह कर भी कुछ न कर पाए !

संपादकीय : बसपा सुप्रीमो का राजनितिक स्टंट

voice news
हमारे रिपोर्टर  
 
 
View All हमारे रिपोर्टर
पंचांग-पुराण   
भगवान आशुतोष के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ धाम के कपाट
करवा चौथ : कल्याणकारी है कार्तिक मास, जानिए इसका महत्व
करवा चौथ : जानिए व्रत विधि, पूजन सामग्री, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त
शारदीय नवरात्र : अष्टमी और नवमी पर करें कन्या पूजन, होगी मां की कृपा !
नवरात्र स्पेशल : मां दुर्गा के प्रतिदिन जपे 108 नाम, हर मनोकामना होगी पूर्ण
live tv
livehindustansamachar.com
livehindustansamachar.com
livehindustansamachar.com
livehindustansamachar.com
 
पंचांग-पुराण   
राशिफल नवरात्रि [ स्पेशल ]
आस्था सुविचार
प्रेरक प्रसंग प्रवचन [कथा ]
व्रत [उपवास ]
 
लाइव अपडेट  
लाइव हिंदुस्तान समाचार वेब न्यूज़ पोर्टल LIVEHINDUSTANSAMACHAR.COM [Editorial Contact for news, business, complaints [ALL INDIA] Sirmaur, District Rewa, Madhya Pradesh HEAD OFFICE Nagar Sirmaur, Tehsil Sirmaur District Rewa [MP] India Zip Code-486448 MAIL ID-AT@ LIVEHINDUSTANSAMACHAR.COM Mob- +919425330281,+919893112422
 
समाचार चैनल  
LOCAL राजनीति
SPORTS जीवन-शैली
BUSINESS CRIME
सर्वे/ आडिट EDUCATION
EDITORIAL अंतर्राष्ट्रीय
SOCIAL MEDIA JOB
INTERTAINMENT आपदा
अनुसंधान ब्लॉग
निर्वाचन-2020 टेक्नोलॉजी
COURT कृषि
HEALTH राष्ट्रीय
प्रशासन कार्यक्रम
भ्रष्टाचार
 
Submit Your News
 
 
 | होम  | आपदा  | राजनीति  | COURT  | जीवन-शैली  | SOCIAL MEDIA  | INTERTAINMENT  | HEALTH  | ब्लॉग  | निर्वाचन-2020  | SPORTS  | प्रशासन  | LOCAL  | EDITORIAL  | EDUCATION  | सर्वे/ आडिट  | JOB  | राष्ट्रीय  | टेक्नोलॉजी  | भ्रष्टाचार  | BUSINESS  | अंतर्राष्ट्रीय  | CRIME  |  कृषि  | कार्यक्रम  | अनुसंधान  | उड़ीसा  | मणिपुर  | सिक्किम  | गुजरात  | छत्तीसगढ़  | मध्य प्रदेश  | उत्तरांचल  | अरुणाचल प्रदेश  | मेघालय  | दिल्ली  | जम्मू और कश्मीर  | नई दिल्ली  | केरल  | नगालैंड  | आंध्र प्रदेश  | चंडीगढ़  | पांडिचेरी  | तेलंगाना  | दादरा और नगर हवेली  | कर्नाटक  | राजस्थान  | त्रिपुरा  | झारखंड  | हरियाणा  | महाराष्ट्र  | दमन और दीव  | पंजाब  | बिहार  | पश्चिम बंगाल  | मिजोरम  | अंडमान एवं निकोबार  | हिमाचल प्रदेश  | असम  | लद्दाख  | गोवा  | तमिलनाडु  | उत्तर प्रदेश  | लक्ष्यदीप  | नियम एवं शर्तें  | गोपनीयता नीति  | विज्ञापन हमारे साथ  | हमसे संपर्क करें
 
livehindustansamachar.com Copyrights 2016-2017. All rights reserved. Design & Development By MakSoft
 
Hit Counter