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 सिरमौर के पिकनिक स्पाट्स को विकसित करेगी एमपी सरकार ! (Sat, Dec 15th 2018 / 16:01:41)

 


[ लाइव हिंदुस्तान समाचार ]
रीवा जिले के सिरमौर में तीन महत्वपूर्ण और अभी तक अनजाने प्राकृतिक पुरातात्विक महत्व के स्थलों को मध्य प्रदेश सरकार जल्द ही विकसित करने जा रही है। इस संबंध में सरकार की ओर से अधिसूचना जारी की जा चुकी है। मध्यप्रदेश वन(मनोरंजन एवं वन्यप्राणी) अधिनियम 2015 के अंतर्गत वन विभाग ने रीवा के पावन घिनौची धाम, आल्हा घाट एवं टोंस वॉटरफॉल को अम्यूजमेंट एरिया(ईकोपर्यटन स्थल) घोषित करने की योजना बनाई है। 
मध्यप्रदेश ईकोपर्यटन नक़्शे में रीवा के इन तीन स्थलों के शामिल होने से अधोसंरचनाओं के निर्माण,विकास कार्य एवं ईको पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। इस संबंध में वन विभाग ने पहले ही राज्य शासन को अधिसूचना जारी करने के लिए प्रस्ताव बना कर भेजा था जिसे लाइव हिंदुस्तान समाचार ने प्रमुखता से उठाया था।  
गौर हो कि अब तक कुल 6 अनदेखे, अनजाने प्राकृतिक एवं पुरातात्विक महत्व के दर्शनीय स्थल मध्यप्रदेश के पर्यटन नक़्शे में अंकित होने के लिए अधिसूचित किये जा चुके हैं,इनमें 3 स्थल वन विभाग द्वारा एवं 3 स्थल संस्कृति विभाग द्वारा अधिसूचित किये गए हैं। भारत सरकार की स्वदेश दर्शन योजना और नैशनल टूरिज्म मैप में लाने के लिए अब जल्द ही पर्यटन स्थलों की विस्तृत जानकारी विभाग भेजने वाला है।
[ आल्हा घाट ]
कहाँ है आल्हा घाट : रीवा जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर की दूरी पर सिरमौर में टोंस पॉवर प्लांट रोड में मुख्य सडक मार्ग से 7 किलोमीटर अंदर दुर्गम निर्जन घने जंगलों में आल्हा घाट स्थित है जहाँ मुख्य सडक मार्ग से सिर्फ पैदल अथवा पगडण्डी मार्ग में साइकिल से ही जाया जा सकता है।
प्राकृतिक महत्त्व : आल्हा घाट विन्ध्य पहाड़ियों के प्राकृतिक दर्रों में से एक है यहाँ से रीवा की टमस नदी गंगा के मैदानों में मिलने के लिये अपना रास्ता प्राप्त करती है, आल्हा घाट के बायें किनारे पर कोनी की पहाड़ियों और रुपौली के बीच टमस नदी की घाटी का खुला मनमोहक द्रश्य है, आल्हा घाट स्थल का प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत, अतुलनीय, विहंगम एवं मनमोहक है।
पुरातात्विक महत्त्व : “आल्हा घाट में एक बहुत बड़ी गुफा है जिसकी लम्बाई 110 फीट है साथ ही चौड़ाई 8– 10 फीट है एवं ऊंचाई 22 से 50 फीट तक है, गुफा का मुख्य प्रवेश द्वार लगभग 10 फीट चौड़ा है, गुफा के अंदर एक किनारे में पूल है जिसमे पानी लगातार गिरता रहता है, गुफा से लगभग 100 गज की दूरी पर पत्थरों का एक बहुत बड़ा ब्लॉक है जिस पर तीन शिलालेख दिखाई देते हैं, इनमे से सबसे अच्छा संरक्षित शिलालेख सात लाइनों का है जिसमे दहालिया राजा नरसिंह देव का उल्लेख है साथ ही तिथि संवत 1216(अर्थात् 1159 ईस्वी) का उल्लेख है यहाँ चट्टान में उकेरी हुई माँ शारदा के अनन्य भक्त लोकदेव आल्हा की एवं गजानन गणेश की प्रतिमा भी है।
[ टोंस वॉटरफॉल ] 
मध्यप्रदेश के रीवा जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर की दूरी पर एवं सिरमौर से 10 किलोमीटर की दूरी पर टोंस जल विद्युत् परियोजना संयंत्र के निकट पहाड़ के मध्य टोंस जलप्रपातों की श्रृंखलायें हैं।   
प्राकृतिक महत्त्व : पहाड़ के मध्य निर्मित सीढ़ियों के चारों तरफ चट्टानों के बीचों-बीच से निकलता हुआ पानी का तेज बहाव देखने में ऐसा प्रतीत होता है मानो दूध की धारायें प्रवाहित हो रही हों। यहाँ की सीढ़ियों में बैठ कर प्राकृतिक वादियों, हरियाली के मध्य इन जलप्रपातों की श्रृंखलाओं का आनंद अद्भुत है। यहाँ के आनंद पश्चात् सीढ़ियों से उतर कर नीचे पहुँचने पर मनमोहक विहंगम प्राकृतिक वादियों एवं हरियाली से परिपूर्ण होने के साथ साथ प्राकृतिक औषधियों एवं फल से भी सम्पन्न है। टोंस वॉटरफॉल की इन्ही घाटियों के मध्य बायें तरफ ही थोडा आगे जाकर नीचे उतरने पर लगभग 500 मीटर के दायरे में 150 फीट की ऊंचाई से जलप्रपातों की श्रृंखलाएँ हैं। यहां करीब 150 फीट की ऊंचाई से नीचे गिरते हुए जलप्रपातों की श्रंखलाओं को देखना, प्रपात से गिरती हुई जलधाराओं का आनंद नयनाभिराम है।
[ पावन घिनौची धाम “पियावन” ]
मध्यप्रदेश के रीवा जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर की दूरी पर रीवा – डभौरा सडक मार्ग में सिरमौर से 6 किलोमीटर की दूरी पर बरदाहा घाटी के पहले मोड़ से दाहिनी हाथ तरफ पगडण्डी कच्चा मार्ग है, वहां से 2 किलोमीटर अंदर जाने पर स्थित है पावन घिनौची धाम जो की धरती से 200 फीट नीचे लगभग 800 फीट चौड़े प्रकृति की सुरम्य वादियों एवं चारों तरफ पहाड़ों से घिरा हुआ है।
प्राकृतिक महत्त्व : पावन घिनौची धाम ‘पियावन’ में पर्यटकों को आकर्षित करने का विशेष कारण है धरती से 200 फीट नीचे दो अद्भुत प्राकृतिक जल प्रपातों का संगम, जिनका आनंद पर्यटक वर्षा काल में जुलाई से नवम्बर महीने तक ले सकते हैं। इसके साथ ही यहां अद्भुत प्राकृतिक श्वेत जल द्वारा प्राचीन शिवलिंग का निरंतर स्वतः जलाभिषेक होता है, शिवलिंग में प्राचीन शैल चित्र भी हैं। यहाँ की चट्टानों में उकेरे गए प्रागैतिहासिक शैल चित्र, जिनसे इस क्षेत्र की गौरव गाथा का भी ज्ञान होता है, यहाँ की अद्भुत सर्पिलाकार चट्टानें अपने आप में ही अद्भुत है।
पुरातात्विक महत्त्व : पावन घिनौची धाम ’पियावन’की खोज का श्रेय जाता है सर एचबीडब्ल्यू गैरिक को जो कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण(ASI) के पहले डायरेक्टर जनरल और संस्थापक अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक थे, सन 1880 के दशक की शुरुआत में सर गैरिक को इस स्थान के बारे में पता चला और उन्होंने सन 1883-84 में रीवा राज्य के दौरे पर आये सर कनिंघम को इस बारे में बताया जब सन 1883-84 में अलेक्जेंडर कनिंघम रीवा आये तो उन्होंने पावन घिनौची धाम ‘पियावन’का सर्वेक्षण किया, उन्होंने अपनी किताब ‘रिपोर्ट्स ऑफ़ अ टूर इन रीवा, बुन्देलखंड,मालवा, एंड ग्वालियर इन 1884-85’ में इस स्थान का जिक्र किया है, जहाँ इसे ‘पियावन’ कहा गया है जिसका अर्थ है पानी पीने का स्थान, कनिंघम ने इस स्थान में मौजूद एक शिलालेख के बारे में लिखा है 'अर्घ्य के ऊपर 6 लाइनों में कुछ अभिलेख लिखे हुए थे, यह अभिलेख बहुत कीमती एवं अतुलनीय था क्योंकि यह त्रिपुरी(वर्तमान जबलपुर) के राजा कल्चुरी राजकुमार गांगेय देव का पहला अभिलेख था जो कि महमूद गजनी के समकालीन थे, यह अभिलेख इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि यह चेदि वंश के कल्चुरी राजाओं का अधिराज्य भी प्रदर्शित करता था, जिनका राज्य विन्ध्य पर्वत श्रंखलाओं के उत्तर तक इलाहाबाद से सिर्फ 50 मील कि दूरी तक था, यह अभिलेख सन 1038-39 में लिखवाया गया था।'
शासन द्वारा रीवा के तीन दर्शनीय स्थलों को अधिसूचित किये जाने के बाद अब इन मनोरंजन क्षेत्रों में ईको पर्यटन विकास के तहत अधोसंरचनाओं का निर्माण कार्य किया जायेगा साथ ही ईको पर्यटन गतिविधियाँ भी संचालित होंगी। यहां पर सुगम पहुँच मार्ग, मचान, पैगोडा, कैफेटेरिया, सिट आउट, पार्किंग, जल व्यवस्था, प्रसाधन, चैन लिंक बाउन्ड्री रेलिंग, सीढियों का मरम्मतीकरण इत्यादि का निर्माण होगा साथ ही यहां कैम्पिंग, प्रकृति पथ, ट्रेकिंग, पिकनिक, एडवेंचरस स्पोर्ट्स, फोटोग्राफी, लाँन, गार्डनिंग जैसी ईको पर्यटन गतिविधियाँ चलाई जाएंगी। 

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